गौतम नवलखा की नज़रबंदी दिल्ली हाईकोर्ट ने खत्म की

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को मानवाधिकार कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार गौतम नवलखा को नज़रबंदी से मुक्त करने के आदेश दिए.
महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में गौतम नवलखा को उनके घर में ही 29 अगस्त से नज़रबंद कर रखा गया था.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार हाईकोर्ट ने नवलखा को रिहा करते हुए कहा कि नज़रबंद रखना क़ानून सम्मत नहीं है. इस मामले में नवलखा समेत पांच लोगों को नज़रबंद कर रखा गया है.
28 अगस्त को महाराष्ट्र पुलिस ने देश भर में कथित रूप से माओवादियों से सहानुभूति रखने वाले लोगों के घरों पर छापेमारी की थी. अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की ट्रांजिट रिमांड की अर्जी ख़ारिज करते हुए इन्हें महाराष्ट्र लाने पर रोक लगा दी और उन्हें अपने ही घरों में नज़रबंद रखने का आदेश दिया था.
दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार की शाम को कहा कि महाराष्ट्र पुलिस को निचली अदालत ने जो ट्रांजिट रिमांड की अनुमति दी थी वो भी क़ानून सम्मत नहीं थी और इस अनुमति को भी रद्द कर दिया.
गौतम नवलखा के अलावा वक़ील और ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट सुधा भारद्वाज, तेलुगू कवि वरवर राव, वक़ील अरुण फ़रेरा और वर्नोन गोंजाल्विस को महाराष्ट्र पुलिस ने माओवादियों से संबंध रखने के मामले में अभियुक्त बनाया है.
हाई कोर्ट ने कहा कि पिछले हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट ने चार हफ़्तों में क़ानूनी मदद के लिए लोगों से संपर्क करने की आज़ादी दी थी.
इससे पहले, पुलिस कोर्ट में यह बताने में नाकाम रही थी कि किस अपराध में नवलखा को गिरफ़्तार किया गया है.
28 अगस्त को दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि नवलखा को सुनवाई तक पुलिस दिल्ली से बाहर नहीं ले जा सकती है.
28 अगस्त को महाराष्ट्र पुलिस की पुणे की टीम ने नवलखा को दक्षिणी दिल्ली के नेहरू इनक्लेव स्थित उनके आवास से गिरफ़्तार किया था. नवलखा को पहले स्थानीय कोर्ट साकेत में पेश किया गया था.
साकेत कोर्ट ने नवलखा को पुणे की स्थानीय अदालत में पेश कर पुलिस को ले जाने की इजाज़त दे दी थी.
लखनऊ शहर के एक उन्नत इलाक़े में अमरीकी कंपनी एप्पल के लिए काम करने वाले युवक की हत्या, इस बात का साफ़ प्रमाण है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पुलिस की नज़र में इंसान जान की क़ीमत कितनी कम है.
योगी आदित्यनाथ एक मठ के प्रमुख से उठकर, देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं. उनकी पुलिस किस तरह से न्याय देने के 'पश्चिमी देशों वाले' निरंकुश रवैये को अपना रही है, ये भी इस घटना से साफ़ गया है.
सूबे में अपराध रोकने के नाम पर आदित्यनाथ योगी के नेतृत्व में यूपी पुलिस ने 'एनकाउंटर' जैसे मध्यकालीन साधन अपना लिये हैं, जिन्होंने पुलिस को एक ऐसा शिकारी बना दिया है जो ख़ुद को ही क़ानून समझने लगे हैं.
38 साल के विवेक तिवारी 28 सितंबर की रात अपनी कंपनी की एक पार्टी से घर लौट रहे थे जब उनका सामना यूपी पुलिस के एक जवान से हुआ. पुलिसवाले का दावा है कि उन्होंने विवेक की कार को रोकने की कोशिश की थी.
लेकिन सहज ज्ञान यही कहता है कि देर रात अगर कोई कार रोके तो रुकना ठीक नहीं है. फिर उत्तरप्रदेश में तो इसे लेकर (सुरक्षा पर) चर्चा हमेशा से ही रही है. विवेक ने भी शायद उसी बात का पालन किया.
ऐसा उन्होंने शायद इसलिए भी किया हो कि एक महिला सहकर्मी उनके साथ कार में मौजूद थीं जिन्हें विवेक घर छोड़ने वाले थे.
लेकिन कार नहीं रोकने के जवाब में यूपी पुलिस के जवान ने पिस्टल निकालकर उनपर गोली चलाना ज़्यादा ठीक समझा. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार, गोली कार के अगले शीशे को भेदती हुई विवेक के गले के पास लगी और उनकी मौत हो गई.
विवेक की सहकर्मी सना ख़ान जो कि इस मामले की अकेली चश्मदीद हैं, वो अभी भी सदमे से बाहर नहीं निकल पाई हैं.
लेकिन उन्हें ये ठीक से याद है कि विवेक ने कैसे सड़क के बीच में खड़ी पुलिस की मोटरसाइकल को बचाते हुए अपनी कार आगे निकाली थी. लेकिन ऐसा करने की सज़ा पुलिसवाले ने उन्हें दी.

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